शुक्रवार, २६ फेब्रुवारी, २०१६

रोहित वेमूला ने आत्महत्या नहीं की

स्मरणशक्ती कमकुवत असते म्हणतात समाजाची,म्हणून मग अश्या आठवणी करून द्याव्या लागतात.
रोहिथ मारला हे केव्हाच मागे पडलेलं आहे, आता त्याची नेमकी जात कोणती ह्यावर फक्त कागद रंगवली जाताहेत.
मागच्या वर्षी Milind Dhumale ने लिहिलेल्या लेखाच हिंदी रूपांतर केलेलं ते सगळ्यांना परत आठवण करून द्यायला हि पोस्ट.
केंद्रीय मंत्री स्मृती इराणीजीने लोकसभामे जो भाषण दिया है उससे कुछ अनाडी लोग बहुत प्रभावित हुये है ये बात सच है क्युंकी उनका जोश था हि वैसा.ऐसे किसीभी आवेशपूर्ण विवाद या झगडेमे खासकर महिलाये और निखर जाती है , इसमे उनकका अभिनय भी था ऐसा भी लोग मानते है जो लगता तो नही है.
कभी कभी हम जोश मे ऐसी बाते बोलते है जो नही बोलनी चाहिये.शब्द कमान से निकले तीर कि तरह होते है , उसकी जिम्मेदारी भी आपकीही होती है.उसके जो भी अच्छे बुरे परिणाम है उनका सामना भी करना पडता है.” हम अगर शिक्षणप्रणाली का भगवाकरण कर रहे है ये साबित हो जाये तो तो मै राजनीती छोड दुंगी “ ऐसा उन्होने जोश मे कहा तो है उस हिसाब से उन्होने जल्द से जल्द इस्तीफा देकर राजनीती छोड देनी चाहिये.
पुरे पचास मिनिट कि उनके भाषण कि क्लिप दिखाई जा रही है लेकीन उन्होने ये भाषण एकसाथ पचास मिनिट नही दिया है.उनके भाषण समेत उन्हे किये सवाल और उनके जवाब मिलाकर ये क्लिप बनाकर इसे व्हायरल किया गया है ठीक उसी तरह जिस तरह जेएनयु मामले कि क्लिप व्हायरल कि गई थी.सच्चाई ये है कि कईबार सवालोसे तंग आकर ,जवाब ना दे पाने कि वजह से वो अपनी कुर्सिपर वापस बैठ गयी थी.
ऐसे भाषणमे अक्सर हमे उतना हि दिखाया जाता है जितना दिखाना “ वे “ जरुरी समझते है.शायद ये भी कारण है कि लोगोंको उनका भाषण प्रभावी लगा है. भारतीय मिडिया जिंदाबाद और गोबेल्स बाबा जिंदाबाद.
अहम बात ये है कि विपक्ष का ये आरोप है कि वे सिर्फ अपने मंत्रीमंडल के मंत्रियोके चीठ्ठीयो का जवाब देती है.किन किन लोगोंके साथ उनका पत्रव्यवहार है यही बस आजके भाषण का विषय था.रोहीथ वेम्युला मामले मे उन्होने आठ आठ खत लिखे है ,उस बारे मे सफाई देते हुये उन्होने बताया कि १-५-२०१४ से २३-२-२०१६ के बीच मे पुरे देश से उन्हे कुल ६६२३० खत मिले है जिनंमेसे ६१८९२ खतोको उन्होने जवाब भी दिया है.उन्होने पत्र भेजनेवालो कि जाती धर्म के बारे मे कभी जानकारी नही ली है. १२-२-२०१५ को इक्बाल रसूल धर नामके एक काश्मिरी मुस्लीम विद्यार्थीका फेलोशिप के बारे मे जो मुश्कील आयी थी वो उन्होने दूर कि है.
स्मृतीजी ,आपने कभी किसी कि जाती या धर्म के बारे मे पुछां नही ये सचमुच अच्छी बात है ,वैसे भी अपने देश मे नामसे पता चल हि जाता है के उसकी जाती धर्म क्या है.फिरभी आपने इतने खतो का जवाब दिया ये सराहनीय बात है और एक मंत्री के नाते आपका कर्तव्य भी है.लेकीन इन साठ हजार पत्रो मे सिर्फ एक मुस्लीम व्यक्ती का नाम मिसाल के तौर पे देने कि आपपर नौबत आती है ये भी दुर्भाग्यपूर्ण है.
स्मृतीजी ने कहा है कि उन्होने खुद एक अल्पसंख्य समुदाय कि व्यक्ती से शादी कि है, मुझसे राजनीती ना करे.याद रखनेवाली बात ये है कि उन्होने किसी मुस्लीम से नही बल्की एक पारसी व्यक्ती से शादी कि है.भारत मे अक्सर दलित और मुस्लीम समुदायपर अत्याचार होते है नाकी पारसी समुदाय पर ,पारसी समुदाय तो सायलेंट झोन मे है.इसलिये उनके इस दावे मे कोई तथ्य नही
है
.हनुमंत राव कॉंग्रेस के सांसद है जिन्होने कई चीठ्ठीया स्मृतीजी को लिखी है. जिस उपकुलगुरुकी नियुक्ती कॉंग्रेसने कि है उसी के कार्यकाल मे हैद्राबाद विश्वविद्यालय मे दलित विद्यार्थीयोकी खुद्खुशी कि घटनाए दर्ज कि गई है.इस विषय पर आप न्याय करे.ऐसे पत्र हनुमंत राव ने लिखे है.उसका एक स्मरणपत्र ९-१२-२०१४ का है और आगे का पत्रव्यवहार ४-९-१५ / ३०-९-१५ / ६-१०-१५ / २०-१०-१५ /१९-११-१५ /६-१-१६ , मतलब इस विषय मे कुल छे पत्र स्मृतीजीने भेजे है.मान लिया कि स्मृतीजीने ये पत्र भेजे है मगर उसपर क्या कारवाई हुई है उसके बारे मे कोई जानकारी उपलब्ध नही है.मतलब ये उनका सिर्फ आश्वासन है और सबसे गंभीर विषय यह है कि स्मृतीजी २०१४ से ६ जनवरी २०१६ तक हैद्राबाद युनिव्हर्सिटी मे हनुमंत राव को जवाब तो देती है और रोहित कि हत्या होती है १७ जनवरी २०१६ को.
असल चिंता का विषय तो यही है , सिर्फ खत भेजे है ये केहने से या खत भेजने से मंत्रीजी कि जिम्मेदारी खतम होती है ? अगर केंद्रीय मंत्री खुद खत भेजे और फिर भी युनिव्हर्सिटी उसपर हात पर हात धरे बैठती है ? कुलगुरूके उपर कोई कारवाई क्यू नही होती है ? इसबीच स्मृतीजी श्रीमान बंडारू दत्तात्रेय से पत्रव्यवहार करती है , वो आठ खत रोहीथ और बाकी विद्यार्थियोपर कारवाई करने के लिये थी ये बात क्यू बतायी नही है ?स्मृतीजी भावनावश होकर केह्ती है कि मै भी एक मा हु , मुझे भी दुख हुआ है , रोहीथ तो बच्चा था , अगर ये सच मान ले तो फिर बंडारू दत्तात्रय के पत्रो के सहारे युनिव्हर्सिटी पर कारवाई के लिये दबाव क्यू ला रही थी ? स्मृतीजी आप संसद मे झूठ बोल रही है ? क्या आप सत्य और तथ्य उजागर नही कर रही है ?
स्मृतीजी ने कहा है के पुलिस ने तेलंगण हायकोर्ट मे जो दस्तावेज दिये है उसमे लिखा है ,” हमे शाम ७.२० मिनिट पर सूचना मिली , जब हम वहा पहुंचे तब कमरे का दरवाजा खुला था और रोहीथ कि लाश को नीचे उतारकर टेबल पर रखा गया था.उधर एक सुसाईड नोट भी थी जिसमे मौत के लिये किसीको जिम्मेदार ना ठहराने कि बात लिखी है.”
स्मृतीजी “ किसीको जिम्मेदार ना ठहराने “ कि बात पर बार बार इतना जोर क्यू दे रही है ये समझना तो मुश्कील नही.तेलंगण के एक सांसद जिनका नाम मालूम नही हो पाया है वो केहते है , “ मै और मेरे साथी वही घटनास्थल पर मौजूद थे , हमने इंटेलिजन्स ब्युरो चीफ शिवलाल रेड्डी को फोन किया और उन्हे घटना के बारे मे जानकारी दी , ब्युरो चीफ सिर्फ पंधरा मिनिट मे वहापर आगये.वहापर बहोत भीड थी और भीड गुस्से मे थी. ना वो बॉडी को हात लगाने दे रहे थे ना उसे उतारने दे रहे थे. बंडारू दत्तात्रेय को गिरफ्तार करने कि उनकी मांग थी.ये सब जानकारी देणे के लिये जब स्मृतीजी को फोन लगाया तो उन्होने फोन उठाया नही , फिर हमने सीधा प्रधानमंत्रीजी से फोन पर बात करने कि कोशिश कि “ तेलंगण के सांसद को उसी समय स्मृतीजी ने रोका और बातचीत का रुख बदल दिया.ऐसा क्यू किया गया ये तो आप जान गये होंगे.ऐसा क्यू हुवा ये आपको समझना चाहिये.
खैर , उस सांसद कि बात पर विश्वास करे तो पुलिस ने हायकोर्ट मे झुठी बात कही है , स्मृतीजी जो जानकारी संसद मे दे रही है उस बारे मे वे खुद केह्ती है कि ये उनकी जानकारी नही बल्की जो पुलिस ने बात कही है वो मै पढ रही हु.वे केह्ती है , “ पुलिस को वहा सुबह ६.३० बजेतक आने दिया नही गया , रोहीथ को मेडिकल सहायता नही मिली , ना डॉक्टर को बुलाया गया , उसको बचानेकी कोई भी कोशिश नही कि गई. उसे मृत किसने घोषित किया ? ” स्मृतीजी ये सवाल आप किससे कर रही है ?
रोहीथ कि हत्या युनिव्हर्सिटी मे एक कमेरे मे हुई , उस वक्त युनिव्हर्सिटी का प्रशासन क्या कर रहा था ? डॉक्टर क्यू बुलाया नही गया ? रेसिडेंट डॉक्टर युनिव्हर्सिटी था या नही ? इंटेलिजन्स चीफ क्या कर रहे थे ? इन सबको छात्रो को रोक पाना संभव नही था क्या ?अगर छात्र इतनी ताकद से सरकार और युनिव्हर्सिटी के खिलाफ खडे हो गये तो वो रेस्टीकेट(निकाले) कैसे गये ? अगर डॉक्टर ने मौत करार नही दी तो फिर किसने दी ? फिर उसके अंतिम संस्कार जबरन क्यू किये ? तब पुलिस के पास ऐसी कौनसी ताकद आ गयी ? रोहीथ के घरवालो को तक उसका अंतिम दर्शन करने कि अनुमती नही दी गई , उसके अंतिम संस्कार के कागजात पर अधुरी जानकारी क्यू लिखी गयी ? इतनी जल्दबाजी क्यू ? ये सारी जानकारी संसद सदन मे देनी चाहिये थी या स्मृतीजी आप हि सवाल उठा रही है ?
स्मृतीजी ने रोहीथ कि मृत्यू के मामले कि जांच हेतू एक जांच कमिटी गठीत कि थी ? क्या उसके तथ्य सामने आये है ? कि रोहीथ दलित नही था यही पता कर कमिटी चुप्पी साध बैठी है ? उसकी कोई जानकारी क्यू स्मृतीजी सदन को नही दे रही है ? क्या है जो वो छुपा रही है ? अगर कोटा नही है तो छात्र का प्रवेश गैरकानुनी है जिसको भरे सदन मे स्मृतीजीने कबुला है जिसपर कानुनी कारवाई हो सकती है.बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने मांग कि है कि नयी इन्क्वायरी कमिटी गठीत हो और उसमे एक दलित अधिकारी हो , तो स्मृतीजी उसे मान नही रहि है , क्यू ? किस बात का डर है ?बजाय उसके , “ मै अपना सर काटकर चरणो मे अर्पित करूंगी “ ऐसे फिल्मी डायलॉग क्यू फेकना पडा है ?
जोश मे वो केह तो गयी कि अगर हम शिक्षा प्रणाली का भगवाकरण कर रहे है ये साबित किया तो राजनीती त्याग दुंगी.उनकेही मंत्रीमंडल के सदस्य सांस्कृतिक मंत्री महेश शर्मा एक साक्षात्कार मे केह रहे थे कि हम पाठ्यक्रम मे रामायण /महाभारत को लाने वाले है. इंडियन एक्स्प्रेस के १०-०९-२०१५ , दिव्यमराठी ११-०९-२०१५ और लोकसत्ता ४-२-२०१६ कि खबरो के अनुसार व्यंगचित्र के माध्यम से रामायण /महाभारत आंगणवाडी स्कुलो मे पढाया जायेगा.कितने ऐसे सरकारी स्कूल है जहा धार्मिक गीत सिखाये जाते है , हिंदू त्योहार मनाये जाते है. भाजप नेता श्री सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण के लिये एक वर्कशॉप आयोजित कर चुके है जिसकी शुरुवात जेएनयु मे हुई थी.
ये सब भगवाकरण नही तो और क्या है ?
तो क्या स्मृती इराणी अब राजनीती त्याग देंगी ? क्या अपने पद से इस्तीफा देंगी ?
उन्होने ये घोषणा संसद सदन मे कि है इसलिये महत्वपूर्ण है.
स्मृती इराणी का भाषण सिर्फ भावनाओ का जोश और झूठ का एक बेहतरीन नमुना कहा जा सकता है.
उनके हिसाब से कई बाते बतायी , बहोत सारी छुपायी , पुरा रुख कॉंग्रेस कि तरफ कर दिया था , और उस वक्त सदन मे ना सोनिया थी ना राहुल थे और नाही प्रधानमंत्री मौजूद थे.
- आनंद शितोळे 

मंगळवार, २३ फेब्रुवारी, २०१६

नोटबंदी विडंबन बोकील महाराज

कोणे एकेकाळी एका गावात एक सुमारबुद्धी गरीबबोकील रहात होता.
बालबोकील शालेय जीवनात खूप खोडकर होता.शेंगा खाऊन त्याची टरफले तो मुलांच्या दफ्तरात टाकत असे.गुर्जी सर्वांना उभे करत मग बालबोकील म्हणत असे मी शेंगा खाल्ल्या नाहीत मी काजू खातो गुर्जी.आमच्या गावी काजूची बाग आहे. मग याच्याऐवजी एखाद्या गरीबाला फटके मिळत.बालबोकील मार खाणाऱ्या गरीबाकडे तिरक्या नजरेने पहात छद्मी हसत असे.
बालबोकीलचे मराठी संस्कृत फार उच्चकोटीचे होते.ललित लेखन प्रकारात त्यास विशेष रस अन गती होती.तो एकाच वेळी अनेक गूढ रंजक कथांची सरमिसळ करून समोरच्या श्रोतृवर्गाला मंत्रमुग्ध करत असे.शाळेत वत्कृत्वस्पर्धेत त्याने प्रत्येक वर्षी बक्षीस पटकावले होते. बालबोकीलला गाड्यांची खेळणी साठविण्याचा छंद होता.बाबांकडे हट्ट करून तो कुंभाराकडून अशी खेळणी बनवून घेत असे.
घराच्या अंगणात मग रेषा मारून रस्ता आखत असे.त्यांना द्रुतगतीमार्ग बायपास वगैरे नावांचे बोर्ड तो स्वत:च रंगवी.अन सोबतीच्या सवंगड्यांना घेऊन तो अर्थभ्रांती ऑन एक्स्प्रेस हायवे खेळत असे.
बालबोकीलला डॉक्टर डॉक्टर खेळायचाही नाद होता.एका मित्राला झोपवून तो रक्तविरहीत शस्त्रक्रिया कशी करायची याचे प्रात्यक्षिक दाखवी..त्याच्या पोटात गुच्च्या मारी त्याला अर्धमेला केला की शस्त्रक्रिया यशस्वी झाली असे म्हणत टाळ्या वाजवी.मग इतर मुलेही तसेच करत.
फर्ग्युसन महाविद्यालयात असताना तरुणबोकील निसर्गनियमानुसार एका सुंदर युवतीच्या प्रेमात पडला.युवती अशी देखणी कमनीयबांध्याची आरस्पानी सौंदर्याची खाण.तरुणबोकीलही काही कमी नव्हता.शिडशीडीत आणि सुसंस्कृत अन विशेष म्हणजे अतीप्रामाणिक.अधेमधे गोष्टी रंगवून सांगण्याची हातोटी त्यामुळे या गुणांवर कुणी भाळली नाही असे कसे असे कसे?
ही दोघेही कॉलेजात फेमस झाली.प्रत्येकाला बोकील विषयी असूया वाटू लागली. दोघांनी सुखी संसाराची स्वप्ने रंगवली.तीच्या घरून विरोध होता.म्हणून यांनी रजिस्टर पद्धतीने लग्न करण्याचा मार्ग निवडला.
त्यादिवशी तरुणबोकीलने ट्रंकेतला आवडीचा पिवळटराखाडी कोट ज्याला कांजी करून घडी मारून ठेवून दिलेला तो घातला.कोल्हापुरी चपलेला खोबरेल तेल चोळून चमकविले.थोडी स्नोपाउडर थापली अन अंगावर गुलाबपाणी शिंपडून स्वारी कॅन्टीनमध्ये दाखल झाली.
हे सर्व तरुणबोकीलची आई कौतुकाने बघत होती.आपला चिरंजीव आता वयात आला याची जाणीव त्या माऊलीला झाली.बाळां बोकू..कपडे एवढे जपतोस तसे चारित्र्याला घाण लागू नये म्हणूनही जप हो..अन कुणी असेल तर आम्हाला सांगावं,तुला जे पसंत असेल तेच होईल हो..” त्यावेळी बोकू म्हणजे आपला तरुणबोकील (आई त्याला लाडाने बोकू म्हणत असे)एवढा लाजून चूर झाला की चप्पल पायात सरकवता सरकवता धडपडून पडला असता तसाच धडपडत तो आईच्या पायाशी आला अन चरणस्पर्श करत आशिर्वाद दे माते..
असे म्हणून अभिमान गर्वाने तिच्याकडे पाहू लागला.आईनेही मायेने त्याच्या मोठ्या डोक्यावरून चेहऱ्यावरून हात फिरवला अन कानाजवळ बोटे ठेवून ती कडाक्कन मोडली.
तरुणबोकील ठरल्याप्रमाणे चितळेकॅन्टीनमध्ये बराचवेळ बसला तोपर्यंत त्याने दोनतीन मस्तानी लस्सी एकट्यानेच संपविल्या.नंतर करपट ढेकरं यायला लागल्यावर त्याने ते थांबवलं.बराचवेळ वाट पाहूनही ती न आल्याने बोकील निराश झाला.दुसऱ्या दिवशी त्याला मित्रांकडून समजलं की आपली लैला दुसऱ्याच बाजीरावासोबत उडन छू झाली.तरुणबोकीलचा प्रेमावरचा विश्वास उडाला.
त्यानंतर कधीच प्रेम करायचं नाही असं त्याने ठरवलं.तो एकटा एकटा राहू लागला.शिक्षण थांबलं.नोकरीही करावीशी वाटेना.त्यामुळे त्याला आईच्या पेन्शनवरच अवलंबून रहावं लागत असे.एव्हाना विचार करून करून डोक्यावरील केस साथ सोडू लागले होते.टक्कल अर्धेअधिक दिसू लागले.एक दिवस मित्राने अर्धचंद्रबोकीलला सवाईगंधर्व कार्यक्रमाला येण्याचे आमंत्रण दिले.इच्छा नसताना तो तीथे गेला.तर त्याची लैला दोन मुले एक कमरेला एक हाताशी अशी येताना दिसली.सोबत एक देखणा उमदा मध्यमवयीन गृहस्थ.काय समजायचे ते अर्धचंद्रबोकील समजला.तीचा नवरा मुलांना शौचालयात घेऊन गेला.
हि संधी साधत अर्धचंद्रबोकील आपल्याला फसविल्याचा जाब विचारण्यासाठी तीला एकटीला गाठले.जाब विचारताच.लैला फणकाऱ्याने म्हणाली.तूझ्या सारख्या दरिद्री माणसाशी कोण लग्न करणार? खिशात दमडी नसते ना तुझं बँक खातं आहे.प्रेम काही पोटाची भूक भागवत नाही.खायचं काय माती? तू स्वत: आईच्या पेन्शवर जगतोस माझं काय?
अर्धचंद्रबोकीलला हे जिव्हारी लागलं.तो प्रचंड दुखावला.त्याने त्याक्षणी भीष्मप्रतिज्ञा केली.सारी पृथ्वी निरोकड करणार रोकडरहित म्हणजे कॅशलेस करणार आणि संसारी लोकांना त्रास देवून माझ्या एकलेपणाचा सड्यापणाचा प्रतिशोध घेणार.
त्याने लगोलग आपल्यासारखे काही रिकामचोट बुणगे गोळा केले.अर्थभ्रांती नावाने एक मंडळ स्थापन केले.देशाचे नेतृत्व करणाऱ्यास आपले म्हणने पटावे आणि त्यांनी समस्त देशवासीय पृथ्वीवासियांना त्यासाठी मजबूर करावे म्हणून त्यांनी परधानमंत्र्यांची भेट घेण्याचे ठरविले.
परधानमंत्री त्याच टोळीतला रिकामटेकडा माणूस,नुसता गावभर देशविदेशात चकाट्या पिटत हिंडणे.सानुनासिक साभिनयाद्वारे ज्या समाजात जाईल त्या समाजातील महापुरुषांसारखे मला लहानपणापासून हे बनायचं होतं.ते बनायचं होतं हिरो बनायचं होतं व्हिलन बनायचं होतं असे लोकांत जावून सांगणे.रडणे हसणे सेल्फ्या फोटू काढणे इत्यादी मनोरंजनाचे प्रकार हा परधानमंत्री करत असे.
त्याला हा नंबरी इसम भेटला,
परधानमंत्री लगोलग आपल्या अर्थमंत्र्याला बाजूला घेऊन बोललो ..
“व्हयं वो आरुनभौ..द्यीव या का ह्यास्नी येळ? करू थोडा खेळ
तसं बी आता काय काम सूचना सगळं देश फिरून झालं नुसता कटाळा आलाय.
आता जरा कायतरी तुफानी झालं पायजे गड्या..”
अरूनलाही काय काम उरलेलं नव्हतं.तर म्हणाला चला हायकाय अन नायकाय.
मग रातोरात केली बेट्यांनी नोटबंदी कॅशलेस होण्याच्या सूचना केल्या.त्याअगोदर आपला सगळा काळापैसा पांढरा करून घेतला यातील काही मूर्ख नेते पोलिसांच्या हाती सापडले.अळीमिळी गुपचिळी झाली.
अर्धचंद्रबोकील समस्त संसारी लोकांवर सूड उगवला म्हणून मनोमन खुश झाला.अनेक गरीब नुसत्या घोषणेच्या धक्क्याने मरून गेले.
मग तिघांनी माध्यमांच्या समोर येवून ते कसं गरजेचे होतं अशी सारवासारव करायला सुरुवात केली.भ्रष्टाचार दहशतवाद मिटविण्यासाठी मोठा नोटा बंद केल्या पाहिजेत असे म्हणायला सुरुवात केली.अन त्यापेक्षा मोठी दोन ह्ज्जाराची नोट काढली.लोक भडकले.संयम सुटत चालला.
परधानमंत्र्याने नामी शक्कल लढवली थोडासा रडला अन म्हणाला पन्नास दिवसात सगळं सुरुळीत करतो का नाय बघाच.नाय तर मला जाळा (ह्याला कुणी जाळणार नाही हे यालाही माहित होतं पण तसं,म्हणायला काय जातंय?)
पन्नास दिवस अजून पूर्णच झालेले नाहीत अरुनभौ ने दुसरे आर्थिक गणितं मांडून लोकांना आणखी पेचात टाकलं अर्धचंद्रबोकील आता अर्थ तज्ज्ञ बोकील म्हणून प्रसिद्ध झाले.त्यांनी दिलेल्या आयडियाच्या कल्पनेबद्दल त्यांना भारतरत्न देवून परधानमंत्र्यानी गौरव केला.
अशा तऱ्हेने आणखी एक अजोड रत्न भारताला मिळालं.
८ नोव्हेंबर हा जागतिक नोटबंदी बोकील डे म्हणून साजरा करण्याचे नासाने मान्य केले."मी हाय बोकील वाट्टेल ते ठोकील" हे ब्रीदवाक्य प्रसिद्ध झालं.

रविवार, ७ फेब्रुवारी, २०१६

रंगभूमीवरील सेन्सॉरशिप

व्यवस्था चालविणारे सरकार बदलले कि व्यवस्थाचालविणारा पक्ष कोणत्या विचारसरणीचा आहे, त्यावरून व्यवस्थेत काम करणाऱ्या लोकांवर प्रभाव पडतो असे निदर्शनास येते, सरकारला आवडणारे निर्णय घेणे,विशिष्ट विचारसरणीला पोषक पूरक असे वातवरणात निर्माण करणे अशाप्रकारचे उद्योग चालू आहेत,दुसरीकडे सरकार आपल्या मर्जीतील लोक अशा मोक्याच्या ठिकाणी बसवून आपले अजेंडे पुढे रेटण्याचे काम त्यांच्या मार्फत करत असते. पुण्याच्या एफटीआईआईचा वाद सर्वश्रुत आहेच.याअगोदर आपल्याकडे सेन्सॉरनियामक मंडळ म्हणून बाह्य राजकीयपक्षांची समांतर सेन्सॉरशिप म्हणजे समांतर सत्ताकेंद्रच होती, ही झुन्ड्शाही काही विशिष्ट प्रसंगी कृतीशील होते.परंतु आता याचीही गरज उरली नसल्याचे अलीकडील काही धोरण निर्णयावरून दिसते आहे.आकार नाट्यसंस्थेच्या नाट्यलेखक जनार्दन जाधव लिखित जय भिमजय भारत या नाटकाच्या संहितेत असणाऱ्या काही अतिशय साधारण शब्दांवरही घेण्यात आलेले आक्षेप पाहिल्यावर “रंगभूमी परिनिरीक्षण मंडळाचे डोके ठिकाणावर आहे काय?” असा टिळकांच्या आवेशात प्रश्न विचारावासा वाटतो.
हिंदुत्ववादखैरलांजीगांडू बगीचारमाबाईनगरकुत्रा आदी शब्द वापरण्यास रंगभूमी परिनिरीक्षण मंडळाने मनाई केली आहे. तसेच या नाटकात एक संवाद आहे.
“या देशातील मंत्री दलितांना कुत्र्याची उपमा देतो. एक राज्यपाल अल्पसंख्याकांनी दुसऱ्या देशात चालते व्हावेअसे सांगतो. कुणी काय खावे आणि काय खाऊ नये हे सरकार ठरवणार कायकाय चालले आहे या देशात?” यावरही आक्षेप आहे. हे संवाद या अगोदर देशातील इलेक्ट्रॉनिक आणि प्रिंट मिडीयात सतत फिरत होते.हे सत्तेत असणाऱ्या नेत्यांनीच वापरलेले आहेत.तो काही कल्पनाविलास नाही ही वस्तुस्थिती आहे.असे असताना नाटकात एकूण १९ कट्स सुचवले आहेत. वरील आक्षेपांवर विचार केल्यास ते हास्यास्पद तर वाटत आहेतच परंतु विशिष्ट विचारसरणीचा त्यास नक्कीच रंग आहे हे उघडपणे प्रतीत होतेय. आपण रोजच्या व्यवहारातील बोलीभाषेत वापरत असलेले शब्द आणि मुळात ते अश्लील किंवा प्रक्षोभक निंदाजनक नसताना त्यावर आक्षेप घेणे रोचकच म्हणले पाहिजे. वास्तविक कोणत्याही कलेला अशी कायदेशीर सेन्सॉरशिप नसताना महाराष्ट्रात अन देशात काही ठिकाणी ती चित्रपट आणि नाटकांनाच का लागू आहे? हाही एक उपप्रश्न यानिमित्ताने उपस्थित झाला आहे.  
महाराष्ट्र आणि गुजरातसमवेत काही राज्यातच असे रंगभूमी परिनिरीक्षणमंडळ अस्तित्वात आहे, पश्चिम बंगाल ,पंजाब ,राजस्थान ,कर्नाटक ,उत्तर प्रदेश आणि मध्यप्रदेश या राज्यात असे सेन्सॉरशिप बोर्ड अस्तित्वात नाही.महाराष्टाच्या रंगभूमी परिनिरीक्षणमंडळाची स्थापन १९५४ सालात झाली आहे. जेष्ठ नाटककार प्रा.वसंत कानेटकरांनी 1971 सालीच राज्यशासनाने हे नियंत्रक मंडळ तात्काळ बरखास्त करून टाकावे अशी सूचना नाट्‌यसंमेलनाचे अध्यक्ष या नात्याने केली होती.यामुळे अशा मंडळाच्या मुस्कटदाबीची खरेच गरज आहे काय यावर विचार करण्यासारखी परिस्थिती उद्भवली आहे.ज्या जेष्ठ श्रेष्ठ लोकांनी आपली ह्यात नाट्यकलाकृतीसाठी दिली त्यांचे हे मत असेल तर हा पांढराहत्ती शासनाने पोसण्याची काय गरज आहे असे प्रश्न उपस्थित होते.खरेतर नाटक ही थेट प्रेक्षकांशी संवाद साधत अतिशय मर्यादित तंत्रज्ञानसाधन असताना तत्काळ उत्कट अनुभूती देणारी कला आहे.एकीकडे आधुनिकीकरणामुळे माणसांची जीवनशैली समृध्द होत आहे,अभिरुची बदलत आहे, मनोरंजनाचे अनेक पर्याय आज उपलब्ध झाले आहेत. त्यामुळे नाटक हा प्रकार एका विशिष्ट चौकटीत अडकून पडत कालबाह्य होण्याच्या मार्गावर आहे.त्याच्या प्रेक्षक वर्ग मर्यादित आहे. अशा गळचेपीने नाट्यकलेला ऊर्जितावस्था येण्याचा प्रश्न निर्माण होत नाही रंगभूमीसंदर्भात इथे विशेष पोषक वातवरण नाही,अशात हे रंगभूमी परिनिरीक्षण मंडळाचे झारीतील शुक्राचार्य मुस्कटदाबी करायला सरसावले आहेत.पुरोगामी महाराष्ट्राची परंपरा तशी उज्वलच म्हणावी लागेल त्यावेळी महात्मा फुलेंनी साहित्य संमेलनाची अहवेलना करताना त्यांची घालमोड्या दादा अशा आशयाचे पत्र लिहून उपेक्षा केली होती. आता रंगभूमी परिनिरीक्षणमंडळास असे पत्र लिहावे कि काय ? नाटक चांगले असेल तर ते प्रेक्षकांना आवडेल अन्यथा पडेल, यापेक्षा वेगळे काही होणार नाही.नाटकामुळे समाजात वातावरण बिघडल्याच्या घटना घडलेल्या नाहीत. परंतु असे बाळबोध आक्षेप नोंदवत नेमकी कोणती आणीबाणी निर्माण होणार आहे? वंचितांचे प्रश्न मांडल्याने कोणत्या समजाच्या जनभावना  भडकणार आहेत? हे रंगभूमी परिनिरीक्षण मंडळानेच स्पष्ट केले पाहिजे.

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